Friday, December 31, 2010
Shoonya Mein Se
आज से मैं अपने आत्म अंगीय मित्र को किए अपने वादे का अपने तरफ से निर्वाह आरभं करता हूँ। उसके कहने पर वादा किया था कि उसे मध्यस्थ दर्शन को मै समझाउँगा और इस पर मै उसके साथ काम करूगाँ। यह उन दिनों की बात है, जब हम, सात -आठ लोग हुआ करते थे जो अमरकंट्क की लगातार दस दिनों से हो रही बरसाती गीले पन, मोवा घास पर एक-दो मीलि मीटर बर्फ जमा देने वाली ठंढ, खट्मल के मारे अनिद्रा और पू.बाबा के कहे दो वाक्यों के आपसी औचित्यता को परख्नने मे कई-कई घटों की थकान को कभी लाल तो कभी दूध की चाय के सहारे सहते हुए सिर्फ अपने लिए मध्य्स्थ दर्शन को समझने के लिए समय लगाते थे. प्रतीति होने पर जोर से हरी..हर कहते थे........याद है न, कि भूल गए
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