इन दिनों सोचने मे व्यस्त रहा और अनियमित हो गया,खैर मैं अब तक दो बार ब्लाँग राइट किया हूं . पता नहीं दूसरा वाला कैसे पब्लिश नहीं हुआ. उसमे लिखा था कि मेरी जिज्ञासा की पृष्ट्भूमि शैक्षणिक रही है. कोई अनहोनी घटना नहीं रही. इसलिए मित्र, वहाँ से शुरू करना थोडा जटिल हो,तुम्हारे लिए. फिर भी शुरु वहीं से करूंगा, पर सरल भाषा में, मेरे समझ से यही ठीक रहेगा.
अपन जब बारहवीं पास कर रहे थे तब तक यह समझ आ गया था कि अपने साथीयों की पसंद अलग-अलग है और एक समान भी है और समान पसंद वालो से पट्ती भी जम के थी. यहाँ तक कि एक दूसरे को डाँट-मार से बचाने के लिए घर, बाजार और अपने मास्टर जी से झूठ भी बोलते थे. पर उस समय "ऐसा क्यों है?",जानने को नहीं के बराबर मन करता था. घर मे भाई-भाई, बहन-बहन और भाई-बहन के बीच पसंद-नापसंद के झगड़े को माँ-बाप डाँट-प्यार से सुलझा लेते थे.
याद है, पहली बार तुम्हारा मन "ऐसा क्यों है" को जानने-समझने का मन कब और कैसे हुआ. क्या कहा- अपने से कभी नहीं हुआ, हाँ जब से बौद्धिक चर्चा मे शामिल होने लगे हो.यह प्रश्न उठ्ता है, पर बहुत ढंग का जबाब नहीं मिलता.मिलता भी है तो बड़ा जतिल कोशिकाओं की संरचना, संस्कार, जहाँ जन्म हुआ,प्रारब्ध और न मालूम क्या-क्या. उन सब मे सबसे सरल जबाब है "अपनी-अपनी पसंद है"..
अपन जब बारहवीं पास कर रहे थे तब तक यह समझ आ गया था कि अपने साथीयों की पसंद अलग-अलग है और एक समान भी है और समान पसंद वालो से पट्ती भी जम के थी. यहाँ तक कि एक दूसरे को डाँट-मार से बचाने के लिए घर, बाजार और अपने मास्टर जी से झूठ भी बोलते थे. पर उस समय "ऐसा क्यों है?",जानने को नहीं के बराबर मन करता था. घर मे भाई-भाई, बहन-बहन और भाई-बहन के बीच पसंद-नापसंद के झगड़े को माँ-बाप डाँट-प्यार से सुलझा लेते थे.
याद है, पहली बार तुम्हारा मन "ऐसा क्यों है" को जानने-समझने का मन कब और कैसे हुआ. क्या कहा- अपने से कभी नहीं हुआ, हाँ जब से बौद्धिक चर्चा मे शामिल होने लगे हो.यह प्रश्न उठ्ता है, पर बहुत ढंग का जबाब नहीं मिलता.मिलता भी है तो बड़ा जतिल कोशिकाओं की संरचना, संस्कार, जहाँ जन्म हुआ,प्रारब्ध और न मालूम क्या-क्या. उन सब मे सबसे सरल जबाब है "अपनी-अपनी पसंद है"..